छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बाढ़ का कहर: 100 मीटर लंबा पुल बहा, 80 साल का बारिश का रिकॉर्ड टूटा

मूसलाधार बारिश और बाढ़ के कारण छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में इतिहास की सबसे भीषण तबाही हुई है। यह पहली बार है जब इस क्षेत्र में इतने व्यापक पैमाने पर नुकसान देखा गया है। दंतेवाड़ा में 80 साल का बारिश का रिकॉर्ड टूट गया है, जिसके कारण पूरे बस्तर संभाग में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार 26 और 27 अगस्त को दंतेवाड़ा जिले में सबसे अधिक बारिश दर्ज की गई, जहाँ क्रमशः 93.7 मिमी और 118.4 मिमी बारिश हुई। इससे पहले डंकनी नदी पर पुराना पुल डूबने की घटनाएं एक-दो साल के अंतराल में होती रहती थीं, लेकिन इस बार बाढ़ ने अपना विकराल रूप दिखाया और व्यापक तबाही मचाई।

मंगलवार दोपहर बाद दंतेवाड़ा के चूड़ी टिकरा वार्ड और जीएडी कॉलोनी के मकानों से होकर तेज रफ्तार से पानी गुजरता रहा। डंकनी नदी के पानी की तीव्रता इतनी थी कि प्रमुख सरकारी इमारतों की बाउंड्री वॉल ताश के पत्तों की तरह ढह गईं।

इस बाढ़ की सबसे चौंकाने वाली घटना दंतेवाड़ा बायपास मार्ग पर चितालंका में बने पुल का पूरी तरह बह जाना है। दो दशक पहले करीब दो करोड़ रुपए की लागत से निर्मित इस 100 मीटर लंबे पुल के स्लैब और पिलर तक का नामोनिशान मिट गया है। यह पुल दंतेवाड़ा नदी पर बना था और बाढ़ का दबाव सहन नहीं कर सका।

इसके अलावा दंतेवाड़ा में डंकनी नदी का पुराना पुल भी बुरी तरह टूट गया है। बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर से दंतेवाड़ा को जोड़ने वाली नेशनल हाईवे 63 की सड़क भी ग्राम बागमुंडी पनेड़ा के पास तेज बारिश और बाढ़ के कारण बह गई है।

बाढ़ की इस विभीषिका के बीच एक अद्भुत घटना यह है कि डंकनी नदी पर बने श्री राम मंदिर के लकड़ी के ढांचे वाले पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ है। जहां कंक्रीट के बड़े-बड़े पुल बह गए, वहां यह लकड़ी का पुल जस का तस सुरक्षित खड़ा है। राम भक्त इसे चमत्कार से कम नहीं समझ रहे हैं।

बाढ़ के कारण पुलिस अधीक्षक दफ्तर, नगर पालिका कार्यालय, फिल्टर प्लांट बाढ़ की चपेट में आ गए। सर्किट हाउस और जिला पंचायत सीईओ, जिला न्यायालय के न्यायाधीश और अपर कलेक्टर के आवास बाढ़ से घिर गए। फिल्टर प्लांट के पंप हाउस और रिटेनिंग वॉल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं।

राजस्व सचिव एवं आपदा राहत आयुक्त रीना बाबासाहेब कंगाले के अनुसार प्रभावित लोगों के लिए 4 जिलों में कुल 43 राहत शिविर स्थापित किए गए हैं। इनमें दंतेवाड़ा जिले से 1116, सुकमा से 790, बीजापुर से 120 और बस्तर से 170, इस प्रकार कुल 2196 प्रभावितों को राहत शिविरों में ठहराया गया है।

बाढ़ से अब तक 5 लोगों की जान गई है, 17 पशुधन की हानि हुई है, 165 मकानों को आंशिक क्षति और 86 मकानों को पूर्ण क्षति हुई है। शंखिनी नदी की बाढ़ ने दंतेवाड़ा के बालपेट को तबाह कर दिया है। तुमनार में भी भारी तबाही हुई है, जहां बाढ़ ने जमीन के अंदर से बोर का पंप बहा लिया, कई घर ढह गए और ट्रैक्टर भी बह गए।

संकट की इस घड़ी में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) के जवान देवदूत की तरह लोगों को बचा रहे हैं। एनडीआरएफ की टीमों ने अब तक 611 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान एक ऐसे व्यक्ति को बचाया गया जो 29 घंटे तक पेड़ के सहारे अपनी जान बचाए रखा था।

दंतेवाड़ा से नारायणपुर जाने वाले बारसूर पल्ली मार्ग में स्थित पुल जलमग्न होकर दोनों तरफ से कट गया है। दोनों ओर यात्रियों की लंबी कतारें लगी हुई हैं और जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की टीमें बढ़ते जलस्तर को देखते हुए कई घरों को खाली कराने में जुटी हैं।

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मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ के बाढ़ प्रभावित जिलों बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बस्तर में राहत और बचाव कार्यों की जानकारी लेते हुए अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जनता की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

मुख्यमंत्री ने राहत शिविरों में ठहरे सभी लोगों को भोजन, चिकित्सा सुविधा और आवश्यक सामग्री समय पर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। सभी जिलों में होमगार्ड और एसडीआरएफ द्वारा राहत-बचाव कार्य किया जा रहा है।

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दंतेवाड़ा में हुई यह तबाही न केवल तत्काल राहत और बचाव की चुनौती है, बल्कि दीर्घकालीन पुनर्निर्माण की भी बड़ी समस्या खड़ी करती है। 100 मीटर लंबे पुल के पूरी तरह बह जाने से यातायात व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। यह पुल बस्तर संभाग की मुख्य जीवन रेखा था।

राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग सभी जिलों से बाढ़ की स्थिति को देखते हुए निरंतर संपर्क बनाए हुए है और आवश्यक सहयोग प्रदान कर रहा है। दंतेवाड़ा में 80 साल के बारिश के रिकॉर्ड टूटने से यह स्पष्ट हो गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब ऐसी अत्यधिक मौसमी घटनाएं आम हो सकती हैं।

यह प्राकृतिक आपदा न केवल दंतेवाड़ा बल्कि पूरे बस्तर संभाग के लिए एक चेतावनी है कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बेहतर तैयारी और मजबूत अवसंरचना की आवश्यकता होगी।

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