दंतेवाड़ा में 15 नक्सलियों का आत्मसमर्पण: 17 लाख रुपये इनाम वाले टॉप ऑपरेटिव्स भी शामिल

"Armed security personnel in camouflage uniforms conducting operations in a dense forest area with fallen leaves on the ground, representing anti-Maoist operations in Chhattisgarh's Bastar region where 15 Naxalites recently surrendered to authorities."

दंतेवाड़ा, 24 जुलाई 2025: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। गुरुवार को दंतेवाड़ा में 15 नक्सलियों ने वरिष्ठ पुलिस और CRPF अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण किया है, जिनमें कुल 17 लाख रुपये के इनाम वाले पांच टॉप ऑपरेटिव्स भी शामिल हैं। यह घटना राज्य सरकार की ‘लोन वर्रातु’ और ‘पुना मार्गम’ अभियान की सफलता का प्रतीक मानी जा रही है, जो नक्सलियों को हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में वापसी के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से चलाए जा रहे हैं।

आत्मसमर्पण करने वालों में शामिल हैं बड़े नाम

इस बार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों में सबसे बड़ा नाम बुधराम उर्फ लालू कुहराम का है, जिसके सिर पर 8 लाख रुपये का इनाम था। उसकी साथी कमली उर्फ मोती पोतावी पर 5 लाख रुपये का इनाम था। इसके अलावा पोज्जा मडकम (2 लाख रुपये), आयते उर्फ संगीता सोड़ी और पांडे मडवी (दोनों पर 1-1 लाख रुपये) भी शामिल हैं। ये सभी दो दशकों से अधिक समय से नक्सली गतिविधियों में शामिल थे और सुरक्षा बलों पर कई घातक हमलों में संलिप्त रहे हैं।

दंतेवाड़ा एसपी गौरव राय, डीआईजी कमलोचन कश्यप और CRPF अधिकारी राकेश चौधरी की उपस्थिति में हुए इस आत्मसमर्पण समारोह में राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता को दोहराया गया, जिसके तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से समाज की मुख्यधारा में वापस लाने का काम किया जा रहा है।

‘लोन वर्रातु’ और ‘पुना मार्गम’ अभियान की सफलता

यह विकास छत्तीसगढ़ सरकार के ‘लोन वर्रातु’ (गोंडी भाषा में “घर वापस आओ”) और ‘पुना मार्गम’ (नया रास्ता) पहल के तहत एक बड़ी मील का पत्थर माना जा रहा है। ये दोनों राज्य संचालित प्रयास नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर पुनर्वास और समुदायिक एकीकरण के पक्ष में फैसला लेने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से शुरू किए गए थे। बुधराम और कमली, जो एक जोड़ा है और दो दशकों से भी अधिक समय से नक्सली गतिविधियों में गहराई से शामिल रहे हैं, की कथा इस क्षेत्र में वामपंथी चरमपंथ के खिलाफ लड़ाई में एक प्रतीकात्मक मोड़ का प्रतिनिधित्व करती है।

पुलिस अधिकारी उदित पुष्कर ने बताया कि इस पहल की शुरुआत के बाद से अब तक बस्तर में 1,020 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिनमें से 254 के सिर पर इनाम था। इनमें 824 पुरुष और 196 महिलाएं शामिल हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि इस अभियान का व्यापक प्रभाव पड़ रहा है और नक्सली संगठन के अंदर से लोग निकलकर मुख्यधारा में शामिल होने को तैयार हैं।

पुनर्वास और सहायता के वादे

राज्य की संशोधित आत्मसमर्पण नीति के अनुसार, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को कई प्रकार की सुविधाएं और सहायता प्रदान की जाती है। इसमें कौशल विकास प्रशिक्षण, स्वरोजगार सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सुरक्षा गारंटी शामिल है। राज्य सरकार का मानना है कि केवल सख्त कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं हो सकता, बल्कि गुमराह हुए लोगों को सही रास्ता दिखाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना भी उतना ही जरूरी है।

इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को न केवल तत्काल आर्थिक सहायता दी जाती है, बल्कि उन्हें दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए भी तैयार किया जाता है। कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाते हैं ताकि वे अपनी आजीविका कमा सकें। मनोवैज्ञानिक परामर्श के जरिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार किया जाता है ताकि वे समाज में सामान्य जीवन जी सकें।

कैडरों में बढ़ता मोहभंग

अधिकारियों का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले कई कैडरों ने वैचारिक मोहभंग, वरिष्ठ रैंकों द्वारा शोषण और जंगली जीवन की कठोरता को अपने आंदोलन छोड़ने के प्राथमिक कारण बताया है। यह दिखाता है कि नक्सली संगठन के अंदर असंतोष बढ़ रहा है और लोगों का विश्वास इस आंदोलन से उठता जा रहा है। जंगल में रहकर निरंतर भागते रहने, परिवार से दूर रहने और लगातार डर में जीने की स्थिति से तंग आकर कई लोग इस रास्ते को छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिलों से आए हैं, जो लंबे समय से नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहे हैं। इन क्षेत्रों में नक्सली हिंसा के कारण विकास कार्य बाधित रहे हैं और स्थानीय लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है। अब जब खुद नक्सली इस रास्ते को छोड़ रहे हैं, तो यह इन क्षेत्रों में शांति और विकास की संभावनाओं को बढ़ाता है।

बस्तर में एक महत्वपूर्ण मोड़

अधिकारियों का मानना है कि यह केवल एक रणनीतिक जीत से कहीं अधिक है। एक अधिकारी ने कहा, “यह उन विद्रोहियों की बदलती मानसिकता को दर्शाता है जो अब बंदूक से परे शांति, गरिमा और अवसर का जीवन देखते हैं।” यह बयान इस बात को दर्शाता है कि नक्सली आंदोलन की वैचारिक पकड़ कमजोर पड़ रही है और लोग शांतिपूर्ण जीवन की तलाश में हैं।

नक्सली संगठन में अभी भी शामिल अन्य लोगों से अपील करते हुए, प्रशासन ने दोहराया है कि सुलह का रास्ता खुला है और सरकार उन लोगों का समर्थन करने के लिए तैयार है जो वापसी का विकल्प चुनते हैं। राज्य सरकार और सुरक्षा बल निरंतर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण जीवन जीना बेहतर विकल्प है।

राज्य सरकार की रणनीति और भविष्य की योजना

छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल समस्या से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है। एक तरफ वह सुरक्षा बलों के माध्यम से नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास की व्यापक योजना बनाई है। यह दृष्टिकोण दिखाता है कि सरकार समस्या का केवल सैन्य समाधान नहीं चाहती, बल्कि एक समग्र और दीर्घकालिक समाधान की तलाश में है।

राज्य सरकार का मानना है कि नक्सली समस्या की जड़ में सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। इसलिए केवल सुरक्षा कार्रवाई से यह समस्या हल नहीं हो सकती। विकास कार्यों को तेज करना, स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करना, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना भी उतना ही जरूरी है।

स्थानीय समुदाय और मीडिया की प्रतिक्रिया

स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज के समूहों ने इस विकास का स्वागत किया है और इसे स्थायी शांति की दिशा में एक कदम माना है। मीडिया कवरेज मुख्यतः सकारात्मक रहा है, जो आत्मसमर्पण करने वालों की मानवीय कहानियों और पुनर्एकीकरण के लिए राज्य के प्रयासों पर केंद्रित है। यह दिखाता है कि समाज में इस तरह की पहल के लिए व्यापक समर्थन है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि जब खुद नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं, तो यह क्षेत्र में शांति और विकास की नई शुरुआत का संकेत है। वे उम्मीद करते हैं कि अब उनके बच्चे सुरक्षित माहौल में शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और क्षेत्र का विकास तेजी से हो सकेगा।

आगे की चुनौतियां और अवसर

हालांकि यह आत्मसमर्पण एक बड़ी सफलता है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं। नक्सली संगठन अभी भी कई क्षेत्रों में सक्रिय है और उसका नेतृत्व इस तरह के आत्मसमर्पण को रोकने की कोशिश कर सकता है। इसलिए सुरक्षा बलों को निरंतर सतर्क रहने की जरूरत है।

साथ ही, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का सफल पुनर्वास सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए न केवल आर्थिक सहायता की जरूरत है, बल्कि मानसिक और सामाजिक सहायता की भी आवश्यकता है।

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