छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में बुधवार शाम को एक दंतैल हाथी ने भीषण तांडव मचाते हुए चार निर्दोष ग्रामीणों की जान ले ली। यह दिल दहला देने वाली घटना ग्राम पंचायत चिरागा के बेवरा गांव में तब घटी जब एक पिता-पुत्री खेत में धान की रोपाई का काम पूरा कर घर वापस लौट रहे थे। अचानक पीछे से आए क्रोधित हाथी ने दोनों को बेरहमी से पटक-पटककर मौत के घाट उतार दिया।
इस भयावह घटना का अंत यहीं नहीं हुआ। उसी दंतैल हाथी ने अपना कहर जारी रखते हुए पास के बकिला गांव में प्रवेश किया और एक महिला को कुचलकर मार डाला। कुछ ही मिनटों बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति भी इस जंगली जानवर के गुस्से का शिकार हो गया। इस तरह एक ही दिन में चार परिवारों के चिराग बुझ गए।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस त्रासदी की आहट पहले से ही मिल रही थी। पिछले कुछ महीनों से इस क्षेत्र में हाथियों का आना-जाना लगातार देखा जा रहा था, लेकिन वन विभाग की ओर से कोई ठोस सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई। ग्रामीणों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि यदि समय रहते चेतावनी और बचाव के उपाय किए गए होते तो यह काला दिन नहीं देखना पड़ता।
घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। क्षेत्रीय वन अधिकारियों ने हाथी की गतिविधियों पर नजर रखने की बात कही है, हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग की लापरवाही इस त्रासदी का मुख्य कारण है।
यह घटना छत्तीसगढ़ में बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष की गंभीरता को उजागर करती है। आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2025 से अब तक सिर्फ सरगुजा जिले में ही पांच ग्रामीणों की जान हाथियों के हमले से जा चुकी है। पिछले सप्ताह लुंड्रा वन परिक्षेत्र के असकला इलाके में भी दो दिन में तीन लोगों की मौत हो गई थी। राज्य के अन्य जिलों जशपुर, बलरामपुर, कोरबा और धमतरी में भी हाथी-मानव संघर्ष की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों की कटाई, मानव बस्तियों का विस्तार और हाथियों के प्राकृतिक गलियारों में बाधा इस समस्या की जड़ है। हाथियों के निवास स्थान सिकुड़ने से वे भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों में प्रवेश करने को मजबूर हैं। वन विभाग द्वारा हाथी-मित्र दल का गठन, सोलर फेंसिंग, ट्रैकिंग कॉलर जैसे उपाय शुरू किए गए हैं, लेकिन ये पर्याप्त साबित नहीं हो रहे।
इस दुखद घटना ने पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल बना दिया है। ग्रामीण अब बिना सुरक्षा के खेत-खलिहान जाने या घर से बाहर निकलने से डर रहे हैं। मृतकों की पहचान की प्रक्रिया जारी है और परिवारों को मुआवजे की घोषणा का इंतजार है।
यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है जिसके लिए तत्काल और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है। वन संरक्षण, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और ग्रामीणों के लिए त्वरित राहत व्यवस्था जैसे कदम उठाने होंगे। सरगुजा की यह त्रासदी एक चेतावनी है कि यदि अभी भी ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो और भी कई परिवारों को इस तरह के दुख का सामना करना पड़ सकता है।