भूपेश बघेल की सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर आज होगी सुनवाई, CBI-ED की शक्तियों को दी चुनौती

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके बेटे चैतन्य बघेल की याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। शराब घोटाला मामले में दोनों ने केंद्रीय जांच एजेंसी CBI और प्रवर्तन निदेशालय ED की अधिकार क्षेत्र और जांच शक्तियों को चुनौती दी है। मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच करेगी।

भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में दो अलग याचिकाएं दायर की हैं जिसमें उन्होंने CBI और ED की जांच शक्तियों की वैधता पर सवाल उठाए हैं। साथ ही शराब घोटाला और महादेव सट्टा एप के मामलों में अग्रिम जमानत की मांग की है। पूर्व मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि वे जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करेंगे।

मामले में एक अहम मोड़ यह है कि 18 जुलाई को ED ने चैतन्य बघेल को गिरफ्तार किया था, जो संयोग से उनका जन्मदिन भी था। चैतन्य फिलहाल रायपुर जेल में 14 दिन की न्यायिक रिमांड पर हैं, जो आज समाप्त हो रही है। उन्होंने भी अलग से सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर की है।

चैतन्य बघेल की याचिका में दावा किया गया है कि उनका नाम न तो ED की FIR में है और न ही किसी गवाह के बयान में उनका उल्लेख है। याचिका में कहा गया है कि उन्हें राजनीतिक मकसद से गिरफ्तार किया गया है।

दूसरी ओर, ED का आरोप है कि चैतन्य बघेल ने 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध की आय को संभाला है। एजेंसी का दावा है कि शराब घोटाले से मिली 16.7 करोड़ रुपये की रकम का इस्तेमाल उन्होंने अपने रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए किया। इसके अलावा एक जौहरी से 5 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज लिया था।

भूपेश बघेल ने इन सभी कार्रवाइयों को राजनीतिक बदला करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ED का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने बेटे की जन्मदिन पर गिरफ्तारी के समय को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

यह पूरा मामला 2,161 करोड़ रुपये के कथित शराब घोटाले से जुड़ा है, जो भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री कार्यकाल 2019 से 2022 के दौरान हुआ था। इसके अतिरिक्त महादेव सट्टा एप के मामले में भी CBI जांच चल रही है।

आज की सुनवाई केंद्रीय जांच एजेंसियों की शक्तियों के संबंध में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकती है, खासकर उन राज्यों के संदर्भ में जहां सामान्य सहमति वापस ले ली गई है। कानूनी विशेषज्ञों की नजर इस मामले पर टिकी है क्योंकि यह भविष्य में केंद्रीय एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है।

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