छत्तीसगढ़ सड़क हादसा: खट्टी मोड़ पर डिवाइडर से टकराई बाइक, 108 एंबुलेंस एक घंटे देर से पहुंची, 18-वर्षीय युवक गंभीर

रायपुर से जतमई-घटारानी दर्शन के लिए रवाना हुए चार मित्रों की सुबह 6 बजे खट्टी मोड़ पर भयावह दुर्घटना हो गई। तेज रफ्तार में मुड़ते समय बाइक डिवाइडर से टकरा गई और 18-वर्षीय हरिकुमार बाग के पेट में लोहे की मोटी रॉड धँस गई। युवक सड़क पर गिरकर तड़पता रहा, उसके तीनों साथी और राहगीर मदद के लिए चीख-पुकार करते रहे, लेकिन जिस संजीवनी 108 एंबुलेंस पर क्षेत्र की जनता भरोसा करती है, वह स्वयं दुर्घटना-स्थल तक पहुँचने में नाकाम सिद्ध हुई। सूचना मिलते ही एंबुलेंस को रवाना तो कर दिया गया, पर वाहन मौके पर पहुँचने में पूरे एक घंटे लगा बैठा; वहाँ आकर भी उसका इंजन स्टार्ट नहीं हुआ, जिससे अमूल्य समय नष्ट हो गया और घायल का काफी खून बह गया।

इंसानी करुणा ने तब जान बचाई, जब एक राहगीर ने अपनी निजी कार से हरिकुमार को पांडुका प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया। वहाँ प्राथमिक उपचार के बाद युवक को रायपुर के बड़े अस्पताल रेफर कर दिया गया, जहाँ उसकी हालत अब भी चिंताजनक बताई जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय पर चिकित्सा सहायता मिल जाती तो रक्तस्राव पर तुरंत काबू पाया जा सकता था। यह लापरवाही स्वास्थ्य महकमे की व्यवस्थागत कमजोरी की ओर स्पष्ट इशारा करती है।

दुर्घटना-स्थल खट्टी मोड़ पिछले कई वर्षों से ब्लैक स्पॉट के रूप में बदनाम है। सड़क चौड़ी होने के बावजूद एजेंसी ने बैरिकेड्स बिल्कुल किनारे लगा रखे हैं। तेज या सामान्य किसी भी गति पर बाइक सवार को मोड़ काटते वक्त ज़रा-सा भी संतुलन बिगड़ने पर सीधा बैरिकेड्स से टकराना या सड़क पर गिरना लगभग तय है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस जगह पर दर्जनों हादसे हो चुके हैं, जिनमें कई मौतें और स्थायी अपंगता के मामले शामिल हैं। जतमई-घटारानी इलाक़े में सावन के दौरान पर्यटकों का भारी जमावड़ा रहता है; ऐसे में किसी भी क्षण बड़ा हादसा होने का ख़तरा बना रहता है, पर सुरक्षा प्रबंध अद्यतन नहीं किए गए हैं।

क्षेत्रवासी बताते हैं कि आपातकालीन सेवाओं की हालत बदतर होती जा रही है। 108 एंबुलेंस अक्सर समय पर नहीं पहुँचती, कभी डीज़ल खत्म तो कभी तकनीकी ख़राबी आगे की मदद रोक देती है। ग्रामीणों का आरोप है कि नियमित सर्विसिंग न होने से वाहन जर्जर अवस्था में चल रहे हैं; चालक और मेडिकल टेक्नीशियन की कमी भी आम बात हो गई है। कई बार संजीवनी कॉल सेंटर में फ़ोन व्यस्त मिलता है और समन्वय में देर होती है, जिसके चलते स्वर्णिम घंटा कहलाने वाला शुरुआती समय यूँ ही बीत जाता है।

घटना के बाद गाँववालों ने सड़क पर प्रदर्शन कर बैरिकेड्स को तुरंत पुनर्स्थापित करने, चेतावनी संकेतक लगाने और स्पीड ब्रेकर बनाने की माँग उठाई। उनका कहना है कि जब तक बैरिकेड्स को कम-से-कम एक मीटर भीतर करके मोड़ पर पर्याप्त आर्क देना तथा रेट्रो-रिफ्लेक्टिव बोर्ड लगाना सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक दुर्घटनाएँ थमने वाली नहीं हैं। साथ ही ग्रामीण यह भी चाहते हैं कि टूरिस्ट सीज़न में हाईवे पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए और सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग प्रस्तावित किया जाए।

स्वास्थ्य विभाग ने फिलहाल मामले पर आंतरिक जाँच बैठा दी है। ज़िला मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने आश्वासन दिया कि संबंधित एंबुलेंस को सेवा से हटाकर कारण पता किया जाएगा, कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी और भविष्य में विस्तृत प्रोटोकॉल लागू किए जाएँगे। मगर स्थानीय युवाओं का कहना है कि जाँच समितियाँ पहले भी बनी हैं, रिपोर्टें फाइलों में दब जाती हैं और हालात जस-के-तस रहते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इस बार वास्तव में सुधार देखने को मिलेगा या हादसे अख़बार की सुर्खियों से आगे फिर गुम हो जाएँगे?

इस ताज़ा दुर्घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सड़क इंजीनियरिंग की छोटी-सी चूक और आपातकालीन व्यवस्थाओं की सुस्ती मिलकर जानलेवा साबित होती है। खट्टी मोड़ जैसे ब्लैक स्पॉट का शीघ्र साइंटिफिक ऑडिट, 108 एंबुलेंस बेड़े का कायाकल्प और चिकित्सा कर्मियों की त्वरित उपलब्धता—अगर प्रशासन जल्द लागू नहीं करता, तो आने वाले दिनों में और भी निर्दोष यात्रियों को जान से हाथ धोना पड़ सकता है। आखिर सड़क सुरक्षा और समय पर इलाज नागरिकों का मूल अधिकार है, इसे बरकरार रखना शासन की पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।

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