रायपुर, 23 अगस्त 2025 – छत्तीसगढ़ राज्य में आज भाद्रपद मास की अमावस्या के अवसर पर पारंपरिक पोला पर्व मनाया गया। यह त्योहार प्रदेश की कृषि संस्कृति और पशुधन के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है, जिसे किसानों और पशुपालकों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार कहा जाता है।
पोला पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग है, जो प्रदेश के गांव-गांव में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह कृषि कार्य में सहायक बैलों को समर्पित है।
बैलों की पूजा और सजावट की परंपरा
इस दिन प्रदेश भर के किसानों ने अपने बैलों को कृषि कार्य से पूर्ण विराम देकर उनकी पूजा-अर्चना की। परंपरा के अनुसार बैलों को नदी, तालाब या कुएं के पास ले जाकर स्नान कराया गया। इसके बाद उनके शरीर पर हल्दी, तेल, सिंदूर और गोबर लगाकर उन्हें सजाया गया।
बैलों की सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाया गया और उनके गले में घंटियां, पायल और झुनझुने बांधे गए। फूलों की माला और रंगबिरंगे कपड़ों से बैलों को सजाकर विधि-विधान से पूजा की गई।
पूजा के उपरांत बैलों को गुड़, चना, धान और विशेष पकवान खिलाए गए। इसके बाद उन्हें खेत की मेड़ों पर दौड़ाया गया, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पोला दौड़’ कहा जाता है।
बच्चों के लिए विशेष आकर्षण
पोला पर्व में बच्चों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। मिट्टी, लकड़ी या आटे से बने छोटे-छोटे बैल, जिन्हें ‘नंदिया बैल’ कहा जाता है, बच्चों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।
इन मिट्टी के खिलौनों को रंग-बिरंगे कपड़ों और झंडियों से सजाकर बच्चे गांव-मोहल्लों में घूमे और “पोला-पोला” कहते हुए मिठाइयां और उपहार प्राप्त करते रहे। यह परंपरा नई पीढ़ी को कृषि और पशुधन के महत्व से जोड़ने का अनूठा तरीका माना जाता है।
गांव-गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम
प्रदेश के गांवों में पोला पर्व के अवसर पर मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। महिलाओं द्वारा पारंपरिक सुआ गीत गाए गए, जबकि पुरुषों ने करमा और डंडा नृत्य प्रस्तुत किया।
बलौदाबाजार जिले के लवन तहसील अंतर्गत ग्राम कोरदा में 128 वर्षों से चली आ रही अनूठी परंपरा के अनुसार आज भी पोला मेला का आयोजन किया गया। इस मेले की विशेषता यह है कि यहां रुपए-पैसे के बदले केवल रोटी और पकवानों के बदले मिट्टी से बने खिलौने मिलते हैं।
पारंपरिक व्यंजनों का आनंद
पोला पर्व के अवसर पर घरों में विशेष पकवान तैयार किए गए। ठेठरी, खुरमी, अईरसा, पूड़ी, बड़ा, भजिया जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। इन पकवानों को पहले भगवान को अर्पित किया गया और फिर बैलों को भी खिलाया गया।
कृषि संस्कृति का प्रतीक
पोला पर्व का नाम बैलों के गले में पहनाए जाने वाले लकड़ी के जुए ‘पोला’ से पड़ा है। जब पहली बार बैलों को हल चलाने के लिए तैयार किया जाता है, तो उनके गले में यह लकड़ी का जुआ डाला जाता है।
यह त्योहार केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति और कृषि संस्कृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। यह पर्व याद दिलाता है कि मानव जीवन पूर्णतः पशुधन और प्रकृति पर निर्भर है।
पूरे मध्य भारत में मनाया जाता है त्योहार
पोला पर्व केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी मनाया जाता है। हर राज्य में इसे अलग नाम और परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
महाराष्ट्र में इसे ‘बैल पोला’ के नाम से जाना जाता है, जबकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसे ‘पोला पंडुगा’ कहते हैं। मध्य प्रदेश में भी यह त्योहार समान उत्साह के साथ मनाया जाता है।
आधुनिक युग में महत्व
आज के मशीनीकृत कृषि के युग में भी पोला पर्व का महत्व बना हुआ है। यह त्योहार नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और पारंपरिक कृषि पद्धतियों की महत्ता समझाने का काम करता है।
ग्रामीण एकजुटता, भाईचारे और सामूहिकता का यह प्रतीक माने जाने वाला त्योहार आज भी समान उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। पूरे गांव के लोग मिलकर इस पर्व को मनाते हैं, जिससे आपसी सहयोग की भावना मजबूत होती है।
छत्तीसगढ़ का पोला पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि ग्रामीण जीवन का उत्सव और लोक संस्कृति की जीवंत धड़कन है। यह त्योहार किसानों की आस्था, परंपरा और मानव-पशु के बीच पवित्र संबंध का प्रतीक बनकर आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।