नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच Mahanadi Water Dispute को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब सौहार्दपूर्ण समाधान की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। शनिवार को यहां हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों ने मतभेदों को दूर करने के लिए चर्चा की और लोगों के हित में एक सहमति-आधारित हल निकालने पर जोर दिया। अधिकारियों के अनुसार, यह पहल न केवल महानदी जल विवाद को हल करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि पूरे देश के लिए interstate water disputes के समाधान का एक उदाहरण बन सकती है।
महानदी, भारत की प्रमुख पूर्व-बहने वाली नदियों में से एक है, जो छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले से निकलकर ओडिशा से गुजरते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। इस नदी का जल दोनों राज्यों के लिए कृषि, उद्योग और पेयजल की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षों से छत्तीसगढ़ द्वारा महानदी पर बांध और बैराज निर्माण को लेकर ओडिशा ने आपत्ति जताई है, जिससे जल प्रवाह में कमी आने का आरोप लगाया जाता रहा है। यह विवाद 2016 से और अधिक तीव्र हुआ, जब ओडिशा ने छत्तीसगढ़ पर जल रोकने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, अब दोनों राज्य बातचीत के माध्यम से इस महानदी जल विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, जो interstate river water sharing के क्षेत्र में एक सकारात्मक संकेत है।
शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और ओडिशा के मुख्य सचिव के अलावा दोनों राज्यों के जल संसाधन विभागों के सचिव भी शामिल हुए। बैठक का मुख्य उद्देश्य महानदी नदी के जल बंटवारे पर उत्पन्न मतभेदों को दूर करना था। अधिकारियों ने बताया कि दोनों पक्षों ने विवाद की जटिलता को स्वीकार किया, लेकिन इसे सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक में यह सहमति बनी कि सितंबर 2025 से शुरू होकर, दोनों राज्यों के इंजीनियरों और विशेषज्ञों से बनी तकनीकी समितियां हर सप्ताह बैठक करेंगी। ये समितियां प्रमुख मुद्दों की पहचान करेंगी, संभावित समाधानों पर विचार करेंगी और महानदी जल प्रबंधन के लिए एक बेहतर समन्वय ढांचा विकसित करने के तरीकों पर काम करेंगी।
यह कदम महानदी जल विवाद समाधान की दिशा में एक ठोस प्रगति है, क्योंकि पहले ऐसे विवादों में अदालती हस्तक्षेप या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ही देखने को मिलते थे। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने भी इस बैठक का स्वागत किया है और कहा है कि साप्ताहिक बैठकों से विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि दोनों राज्य पड़ोसी हैं और महानदी नदी दोनों के लिए जीवनदायिनी है, इसलिए जल बंटवारे को लेकर कोई भी फैसला पारस्परिक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। इसी तरह, छत्तीसगढ़ की ओर से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया आई है, जहां अधिकारियों ने कहा कि यह पहल नदी संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन के लिए एक मिसाल कायम करेगी।
अक्टूबर में मुख्य सचिव स्तर पर एक और बैठक का आयोजन किया जाएगा, जिसमें जल संसाधन सचिवों की भागीदारी भी होगी। यदि इन बैठकों में प्रगति बनी रही, तो दिसंबर तक दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक हो सकती है, जो महानदी जल विवाद के अंतिम समाधान की दिशा तय करेगी। अधिकारियों का मानना है कि यह प्रक्रिया न केवल विवाद को हल करेगी, बल्कि दोनों राज्यों के बीच विश्वास बहाली में भी मददगार साबित होगी। महानदी नदी के जल पर निर्भर लाखों किसान और उद्योग इस समाधान से लाभान्वित होंगे, क्योंकि जल की कमी से फसल उत्पादन प्रभावित होता है और आर्थिक विकास रुक जाता है।
महानदी जल विवाद का इतिहास काफी पुराना है। 19वीं सदी से ही इस नदी के जल उपयोग को लेकर चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन स्वतंत्र भारत में यह विवाद अधिक उग्र हुआ। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से ओडिशा ने आरोप लगाया कि ऊपरी इलाकों में बांध बनने से निचले इलाकों में जल की उपलब्धता कम हो गई है। उदाहरण के लिए, हीराकुद बांध, जो ओडिशा में है, महानदी के जल पर निर्भर है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बैराज से जल रोके जाने की शिकायतें रही हैं। केंद्र सरकार ने भी इस विवाद में मध्यस्थता की कोशिश की है, और 2018 में महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था, लेकिन अब राज्य स्तर पर बातचीत से समाधान की उम्मीद जगी है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में interstate water disputes आम हैं। कावेरी, गोदावरी या यमुना जैसे नदियों पर भी ऐसे विवाद देखे गए हैं, जो कभी-कभी राजनीतिक मुद्दा बन जाते हैं। यदि छत्तीसगढ़ और ओडिशा महानदी जल विवाद को बातचीत से हल कर लेते हैं, तो यह अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकता है। अधिकारियों ने कहा कि ईमानदारी और खुले मन से की गई चर्चा से कोई भी समाधान पारस्परिक रूप से लाभदायक होगा। इससे न केवल जल संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
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बैठक में दोनों राज्यों ने महानदी नदी के संरक्षण पर भी जोर दिया। जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों में जल स्तर घट रहा है, और महानदी भी इससे अछूती नहीं है। तकनीकी समितियां न केवल विवाद समाधान पर काम करेंगी, बल्कि नदी बेसिन प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और सूखा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर भी विचार करेंगी। ओडिशा में महानदी के किनारे बसे शहर जैसे संबलपुर और कटक जल की कमी से प्रभावित होते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में रायपुर और बिलासपुर जैसे इलाके नदी पर निर्भर हैं। इस विवाद के समाधान से दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, क्योंकि कृषि उत्पादन बढ़ेगा और उद्योगों को स्थिर जल आपूर्ति मिलेगी।
केंद्र सरकार भी इस पहल का समर्थन कर रही है। जल शक्ति मंत्रालय के अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया और राज्य स्तर की बातचीत को प्रोत्साहित किया। यह कदम राष्ट्रीय जल नीति के अनुरूप है, जो interstate cooperation को बढ़ावा देती है। यदि यह प्रक्रिया सफल होती है, तो महानदी जल विवाद समाधान की सफलता की कहानी पूरे देश में फैलेगी, और अन्य विवादों के लिए प्रेरणा बनेगी। दोनों राज्य अब सितंबर से शुरू होने वाली साप्ताहिक बैठकों की तैयारी में जुट गए हैं, जहां डेटा शेयरिंग, जल मापन और संयुक्त परियोजनाओं पर चर्चा होगी।
कुल मिलाकर, यह बैठक महानदी जल विवाद के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ रही है। जहां पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर था, वहां अब सहयोग और समझौते की बात हो रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चला, तो दिसंबर तक एक स्थायी समाधान निकल सकता है, जो दोनों राज्यों के लोगों के लिए राहत की खबर होगी। महानदी नदी, जो जीवनदायिनी है, अब विवाद की बजाय एकता का प्रतीक बन सकती है।