हाई-प्रोफाइल मनी लॉन्ड्रिंग जांचः ईडी ने अनील अंबानी से जुड़े मुंबई के कई प्रॉपर्टीज पर छापे मारे

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मुंबई, 24 जुलाई 2025: भारत के जांच एजेंसी एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने आज सुबह मुंबई समेत दिल्ली के कई हिस्सों में, अनील अंबानी के रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (R-ADAG) से जुड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों, ऑफिसों और कंपनियों के दफ्तरों पर बड़े पैमाने पर छापा मारा है। इन कार्रवाइयों का सम्बन्ध लोन फ्रॉड, डिफॉल्ट और पैसे की भरपाई में हेराफेरी के आरोपों से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच से बताया जा रहा है। जांच टीमों ने सुबह 9 बजे के आसपास से ये कार्रवाई शुरू की और अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक जगहों पर छापे मारे जा चुके हैं।

जांच एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक, बैंक ऑफ बड़ौदा, एनएचबी और यस बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों द्वारा दिए गए लोन के गलत इस्तेमाल और पैसे की हेराफेरी के आरोप पर ईडी ने ये कार्रवाई की है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) द्वारा रिलायंस कम्युनिकेशन्स (RCom) और उसके प्रमोटर अनील अंबानी को ‘फ्रॉड’ घोषित किए जाने के बाद जांच को नई गति मिली है। एसबीआई ने देश के सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक के रूप में ये कार्रवाई की है और एसबीआई ने आरबीआई तथा सीबीआई को भी इसकी जानकारी दे दी है।

क्या है मामले की पृष्ठभूमि?

इस मामले की शुरुआत साल 2022-23 से हुई, जब बैंक ऑफ बड़ौदा और यस बैंक से रिलायंस कम्युनिकेशन्स तथा ग्रुप की अन्य कंपनियों को लोन दिए गए। इन लोन की रकम सैकड़ों करोड़ रुपए में थी। कुछ समय बाद, इन कंपनियों ने इन लोनों को चुकाने में चूक की और बैंकों को बड़े स्तर पर डिफॉल्ट किया। बैंकों के सामने जब सवाल उठा कि पैसे का इस्तेमाल वास्तव में कहां हुआ, तब जांच में शामिल एजेंसियों को संदेह हुआ कि लोन की रकम का इस्तेमाल उन मकसदों के लिए नहीं हुआ, जिनके लिए लोन दिया गया था। इसके बाद इस पर गहराई से छानबीन शुरू हो गई।

जांच में पाया गया कि लोन की रकम को ग्रुप की दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर किया गया और कुछ पैसे का इस्तेमाल व्यक्तिगत फायदों के लिए भी किया गया। इसके अलावा, ऐसे आरोप भी लगे हैं कि कुछ बैंक अधिकारियों को लोन जारी करने के लिए रिश्वत दी गई। जांच एजेंसियों ने इस मामले में ढेर सारे डॉक्यूमेंट्स, बैंक स्टेटमेंट्स और ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड्स से संबंधित सबूत जुटाए हैं।

ईडी और एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई

इस पूरे मामले में पहले सीबीआई (CBI) और एसबीआई (SBI) ने जांच शुरू की थी। जांच में शामिल सूत्रों ने बताया कि बैंक ऑफ बड़ौदा और यस बैंक से किए गए लोन के गलत इस्तेमाल के संबंध में पहले ही कई अहम दस्तावेज सामने आ चुके हैं। इसके बाद, मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत ईडी ने जांच की जिम्मेदारी संभाली। ईडी ने इस मामले में विभिन्न एजेंसियों से जानकारी ली और उसके बाद छापेमारी शुरू की।

छापेमारी के दौरान ईडी की टीम ने एंबानी ग्रुप से जुड़े कई प्रमुख कार्यालयों, प्रबंधकों के घरों, फर्मों के रजिस्टर्ड ऑफिस और अन्य अहम जगहों पर सर्च ऑपरेशन किया। इस दौरान कई दस्तावेज, लैपटॉप, गाड़ियों, संपत्तियों से संबंधित कागजात, बैंक स्टेटमेंट्स, मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों को जब्त किया गया। जब्त की गई सामग्री में से कुछ में महत्वपूर्ण जानकारी होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे जांच को नई दिशा मिल सकती है।

अनील अंबानी का रुख और ग्रुप की प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले में अनील अंबानी या उनके प्रतिनिधियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, बाजार में चर्चा है कि अंबानी ग्रुप ने पिछले कुछ सालों में बैंकों के साथ टेन्शन के बीच अपने कर्ज की अदायगी के लिए तमाम प्रक्रियाएं पूरी की हैं और कंपनी के फाइनेंशियल पोजिशन को लेकर भी एक्टिव रहे हैं। लेकिन, जांच एजेंसियों का मानना है कि प्राइवेट सेक्टर में बड़ी कंपनियों के द्वारा पब्लिक मनी की लूट की आरोपों की जांच करना उनकी प्राथमिकता है।

एजेंसियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस जांच का उद्देश्य किसी विशेष समूह को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि यह कमजोर कॉर्पोरेट गवर्नेंस, फाइनेंशियल क्राइम और पब्लिक मनी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक लंबी कार्रवाई की शुरुआत है। इस मामले को लेकर वित्तीय बाजार, इंवेस्टर्स और आम जनता के बीच भी काफी चर्चा है।

क्या है एफसीआईआर (FIR) और इसमें क्या आरोप लगाए गए हैं?

इस मामले में एफसीआईआर यानी प्राथमिकी दर्ज की गई है, जिसमें लोन के गलत इस्तेमाल, पैसे की हेराफेरी, रिश्वत, बैंकिंग सिस्टम के साथ धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, ईडी की जांच टीम ने पाया कि कुछ लोन की अप्रूवल प्रोसेस में बैंकों के कर्मचारियों के साथ-साथ कुछ प्रबंधकों का दोष भी सामने आया है, जिन्होंने कर्ज देने के लिए गलत दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और कुछ तारीखों को बदला भी बताया जा रहा है।

इसके अलावा, कुछ शेल कंपनियों को भी शामिल कर लिया गया, जिसके जरिए पैसे का ट्रांसफर हुआ। इसके बाद, इन पैसों का उपयोग एक्सपेंसिव शॉपिंग, विदेशी यात्राएं, प्रापर्टी खरीद और व्यक्तिगत फायदे के लिए किया गया। इस मामले में गहराई से जांच के दौरान, पैसे के फ्लो को ट्रैक करने के लिए ईडी ने बैंक खातों, बेनामी संपत्तियों और डिजिटल ट्रांजेक्शन्स की भी जांच शुरू कर दी है।

जांच की डायरेक्शन और आने वाले चरण

फिलहाल जांच के अगले चरण में, अभियुक्तों और संदिग्धों से ईडी की टीम पूछताछ कर सकती है। पूछताछ के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि पैसों का उपयोग कैसे किया गया और क्या वास्तव में धोखाधड़ी हुई है या नहीं। एजेंसियों का कहना है कि इस मामले में पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता का ध्यान रखा जाएगा और कोई भी गंभीर अपराध साबित होने पर कंपनियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई भी की जाएगी, जिसमें दावे की वसूली, रियल एस्टेट संपत्तियों को कुर्क करना, बैंक खातों को फ्रीज करना और संदिग्धों को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया शामिल हो सकती है।

संदेह क्यों उठे और क्या है तथ्यों की स्थिति?

जब भी कोई बड़ी फाइनेंसियल स्कैम या लोन फ्रॉड का मामला सामने आता है, तो आम जनता और इंवेस्टर्स के मन में कई सवाल उठते हैं। इस मामले में भी, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पैसा कहां चला गया? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए अब ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियां मैदान में हैं। मौजूदा तथ्यों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह साफ है कि 3,000 करोड़ रुपए से अधिक की रकम का गलत इस्तेमाल किया गया, जिसमें बैंकों, इंवेस्टर्स और आम जनता का पैसा शामिल है।

जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ बैंक अधिकारियों ने उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया और दस्तावेजों में हेराफेरी करवाई गई। इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में जब RCom और ग्रुप की अन्य कंपनियों को कर्ज में डूबा हुआ बताया गया, तो लेनदार बैंकों ने इसे RBI के गाइडलाइन के तहत फ्रॉड केस के रूप में चिन्हित किया। इसके बाद, RBI और भारत सरकार ने भी इन मामलों पर सख्ती बरतते हुए तमाम जांचें शुरू कर दी हैं।

आर्थिक और बाजार पर प्रभाव

इस घटना का बाजार और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। मंगलवार सुबह से ही शेयर बाजार में रिलायंस ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। आम निवेशकों और शेयरधारकों के मन में भी भरोसे की कमी देखी जा रही है। अगर यह मामला आगे बढ़ता है, तो इंवेस्टमेंट क्लाइमेट और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर सरकार की ओर से और सख्ती देखने को मिल सकती है।

इस पूरे मामले से बैंकिंग सेक्टर की छवि पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि बैंकों के जरिए ऐसी व्यवस्थाएं कैसे आ गईं, जिससे बड़ी रकम का गलत इस्तेमाल हुआ। वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक ने इसके पहले भी बैंकों को चुस्त और सतर्क रहने की हिदायत दी थी, लेकिन बावजूद इसके ऐसे मामले उजागर हो रहे हैं।

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