छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों की संख्या अचानक कम हो गई है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारतीय निर्वाचन आयोग ने राज्य के 9 राजनीतिक दलों का पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) खत्म कर दिया है। ये वे दल थे जिन्होंने पिछले 6 सालों में किसी भी चुनाव में अपना उम्मीदवार (प्रत्याशी) नहीं उतारा था। कानून के मुताबिक, अगर कोई पार्टी लगातार 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ती, तो उसका नाम निर्वाचन आयोग की सूची से हटा दिया जाता है।
इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ में पहले 55 पंजीकृत राजनीतिक दल थे, अब उनकी संख्या घटकर 46 रह गई है। जिन 9 दलों के नाम हटाए गए हैं, उनमें छत्तीसगढ़ एकता पार्टी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, छत्तीसगढ़ समाजवादी पार्टी, छत्तीसगढ़ संयुक्त जातीय पार्टी, छत्तीसगढ़ विकास पार्टी, पृथक बस्तर राज्य पार्टी, राष्ट्रीय आदिवासी बहुजन पार्टी, राष्ट्रीय मानव एकता कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रीय समाजवाद पार्टी संविधान मोर्चा शामिल हैं।
असल में, छत्तीसगढ़ की राजनीति में मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस का ही दबदबा है। ये दोनों दल हर चुनाव में हिस्सा लेते हैं और ज्यादातर सीटें इन्हीं के खाते में आती हैं। बाकी जो छोटे-छोटे दल थे, उन्होंने लंबे समय से कोई चुनाव नहीं लड़ा था, इसलिए उनका नाम हट गया।
निर्वाचन आयोग का यह फैसला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे राजनीति में पारदर्शिता आएगी और केवल वही दल रहेंगे जो वास्तव में चुनाव लड़ते हैं और जनता के बीच सक्रिय हैं। ऐसे दल जो कई सालों से निष्क्रिय थे, उनका स्थान अब खाली हो गया है।
अगर भविष्य में ये दल फिर से चुनाव लड़ना चाहें, तो उन्हें फिर से निर्वाचन आयोग में आवेदन करना होगा और कानून के सभी नियमों का पालन करना होगा। तभी वे फिर से राजनीतिक दल के रूप में मान्यता पा सकते हैं।
यह कदम दिखाता है कि लोकतंत्र में केवल उन्हीं दलों को मान्यता दी जाएगी जो वास्तव में जनता की सेवा और देश के विकास के लिए काम करना चाहते हैं। इससे न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश की राजनीति में सुधार का रास्ता खुलता है।