छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में हुई दर्दनाक घटना: जंगली हाथी और उसके बच्चे ने तीन लोगों को कुचला, मृतकों में तीन साल का बच्चा भी

23 जुलाई, 2025 (नई दिल्ली/रायपुर): छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के लैलूंगा वन क्षेत्र में जंगली हाथी और उसके बच्चे के आक्रमण से तीन लोगों की मौत हो गई, जिनमें एक तीन साल का मासूम भी शामिल है। यह दर्दनाक घटना मंगलवार रात, 22 जुलाई, 2025 को अंगलीकला ग्राम में घटी, जहां पहले गोसाईडीह गांव के कई घर तबाह हुए और फिर मोहनपुर गांव में भी जान-माल का नुकसान हुआ। वन अधिकारियों का कहना है कि यह राज्य के उत्तरी क्षेत्र में बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष का एक और दुखद उदाहरण है, जहां पिछले पाँच सालों में 320 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। फिलहाल, वन विभाग की टीमें हाथी के झुंड पर नजर बनाए हुए हैं और ग्रामीणों को सावधान रहने की हिदायत दी जा रही है।

घटनाक्रम

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंगलवार रात लैलूंगा वन क्षेत्र, धरमजयगढ़ वन प्रभाग के अंगलीकला क्षेत्र में एक वयस्क मादा हाथी और उसका बछड़ा जंगल से गांव की ओर रुख कर गए। पहला आक्रमण गोसाईडीह गांव में हुआ, जहां हाथी द्वय ने कई घरों को तबाह कर दिया और इसी बीच उन्होंने तीन साल के सत्यम रावत को कुचल दिया। घटना के बाद हाथी-बछिया जोड़ी कुछ दूर मोहनपुर गांव में पहुंच गई, जहां उन्होंने 46 वर्षीय संतारा बाई राठिया और 48 वर्षीय पुरुषोत्तम खड़िया को भी मौत के घाट उतार दिया। दोनों गांव के गांववाले घटना के समय डर की स्थिति में थे और उन्हें समय रहते बचाने की कोई कोशिश नहीं हो सकी। वन विभाग की टीम घटना स्थल पर पहुंची, जिन्होंने मृतकों को बाहर निकाला और परिजनों को तत्काल ₹25,000 की आर्थिक सहायता प्रदान की गई। जिला वन अधिकारी जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि हाथी झुंड पर नजर रखी जा रही है और ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

मानव-हाथी संघर्ष का गंभीर संकट

छत्तीसगढ़, खासकर राज्य का उत्तरी हिस्सा, पिछले एक दशक से मानव-हाथी संघर्ष की कई दर्दनाक घटनाओं का साक्षी रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पाँच सालों में राज्य के सरगुजा, रायगढ़, कोरबा, सूरजपुर और बलरामपुर जिलों में 320 से अधिक लोग हाथियों के आक्रमण से मारे गए हैं। इनमें जमानत की मांग वाले परिवारों में रबी, खरीफ और दूसरी फसलों के वक्त हाथी झुंड का आना आम बात हो चुकी है। बढ़ते घुसपैठ, रास्ता बदलने, जंगलों का कम होना, और इंसानी आबादी का फैलाव ऐसी घटनाओं की बड़ी वजह है। इसमें न तो हाथी की गलती है, न ही गांववालों की – ये दोनों अपनी रक्षा और जीवन के लिए ऐसे विवश होते हैं कि एक का जीवन दूसरे के लिए खतरा बन जाता है।

सरकार और वन विभाग की भूमिका

इस दुखद घटना के बाद ग्रामीणों ने फिर से सरकार और वन विभाग पर सवाल उठाए हैं। वे मानते हैं कि वन विभाग की ओर से समय पर नजर न रख पाना, इलेक्ट्रिक फेंसिंग न होना, गांवों में अर्ली वार्निंग सिस्टम और अधिक रैपिड रेस्पांस टीम्स की कमी इस तरह की घटनाओं को रोकने में बाधा है। इसी वजह से हर साल कई बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और पुरुष हाथी के हमलों में अपनी जान गंवा देते हैं। हालांकि, वन अधिकारियों का कहना है कि हाथियों की बढ़ती आबादी, जंगलों का सिमटना, और पुराने झुंड में नए युवा हाथियों का आना भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। राज्य में 300 से ज्यादा हाथी हैं, लेकिन वनक्षेत्र घटते जा रहे हैं, जिससे हाथी और इंसान के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।

हाथियों के रास्ते बदलने की कहानी

हाथियों के रास्ते बदलने के पीछे भी कई दशकों की कहानी है। छत्तीसगढ़ के कुछ हाथी झुंड ओडिशा-झारखंड कोरिडोर से आते हैं, जिनका पारंपरिक रास्ता अब खेती, रिहाइश, रेलवे लाइन और उद्योगों की वजह से टूट चुका है। इसलिए, वे रास्ता भटककर गांवों में जाने पर मजबूर हो जाते हैं। गर्मियों में तो यह समस्या और बढ़ जाती है, जब जंगलों में पानी और भोजन की कमी होती है। उस वक्त हाथी झुंड किसी भी बाधा को पार करके फसलों, बागों, और यहां तक कि गांवों में घुसने से नहीं चूकते।

मृतकों और उनके परिवारों की पीड़ा

इस घटना में सत्यम रावत सिर्फ तीन साल का था। मासूम केवल घर के आंगन में खेल रहा होगा, उसने शायद ही कभी किसी सांप, खरगोश या कुत्ते से डर भी नहीं देखा होगा – फिर हाथी से क्या टकराव हो सकता था? संतारा बाई राठिया की उम्र 46 साल थी – संभवत: वह रात के खाने के लिए बाहर आयी हों, चूल्हा जलाए हों या फिर दरवाजा खोल कर देख रही हों। 48 साल के पुरुषोत्तम खड़िया की जान भी चली गई – शायद वह रात को खेतों में जानवरों की रखवाली के लिए निकले हों, या रात में घर लौट रहे हों। ये तीनों जिंदगी के साधारण लोग थे, जिन्हें किसी भी हाल में मौत का आगाज नहीं होना चाहिए था, लेकिन मानव-प्रकृति टकराव के चलते ऐसा हो गया।

सरकारी मुआवजा और आर्थिक सहायता

इस घटना के बाद मृतकों के परिजनों को ₹25,000 की राशि तत्काल मदद के रूप में दी गई। यह राशि शायद घर का चूल्हा जलाने, बच्चे का फूलमाड़ी जाना, या फिर मुर्दे की विदाई के लिए चिकित्सा खर्च के लिए पर्याप्त नहीं होगी, लेकिन सरकारी व्यवस्था में यही नियम है। आमतौर पर अंतरिम मुआवजा घटना के तुरंत बाद और अंतिम पुनर्वास की राशि बाद में दी जाती है। हालांकि, किसी भी राशि से परिवारों की पीड़ा दूर नहीं हो सकती, जिन्होंने आजीविका, दैनिक आधार का रोजगार, गृहस्थी का संरक्षक और परिवार का पालनकर्ता खो दिया है।

वन संरक्षण, समय की मांग

यह घटना साबित करती है कि जंगल, वन्य जीव और इंसानों की सह-उपस्थिति के साथ रहने के लिए सही नीति और कार्ययोजना अनिवार्य है। सिर्फ आर्थिक सहायता, मुआवजा, और दुर्घटना के बाद की व्यवस्था ही काफी नहीं है। इसके लिए जरूरी है, जंगल-गांव निश्चित समय पर प्रभावित गांवों में लाउडस्पीकर से अर्ली वॉर्निंग, ट्रीक मेन्टेनेंस, हाथीसोस डेस्क की पर्याप्त संख्या, बैलून और लाइट बैरियर सिस्टम, हमेशा चौकस रहने वाले ट्रैकिंग स्टाफ और ग्रामीणों को जागरूक करने की जरूरत है। वन विभाग को चाहिए कि हाथियों की सांख्यिकी न केवल गणना की जाए, बल्कि उनके ठिकाने, बिहाइवियर, माइग्रेशन पैटर्न पर भी नज़र रखी जाए।

छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की समस्या

यह त्रासदी सिर्फ छत्तीसगढ़ या रायगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। देश में प्रत्येक वर्ष हजारों लोग, वन्य जीव जैसे कि हाथी, बाघ, भालू, शेर, आदि के साथ आमने-सामने आते हैं। इस संघर्ष में वन्य जीव भी मारे जाते हैं, तो इंसान भी। कभी-कभी, रास्ते में आने वाली रेल, ट्रेन, बिजली के तार, कुंए, खदान, कारखाने – ये सब भी जंगलों के रास्ते में आ जाते हैं। ऐसे में, जरूरी है कि केवल दुर्घटना के बाद गिनती न करें, बल्कि दुर्घटना से पहले उसे रोकने की योजना बनाई जाए।

ग्रामीण जागरूकता और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका

कई जगहों पर ग्रामीणों ने सक्रियता दिखाते हुए, हाथी आने की खबर मिलते ही फोन के माध्यम से एक-दूसरे को सूचित किया और बचाव दल को भी सूचना दी। ऐसे प्रयासों को प्रशंसनीय माना जाना चाहिए, लेकिन सरकारी स्तर पर ऐसे उदाहरणों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। स्वयंसेवी संगठन और ग्रामीण विकास मंत्रालय को भी ऐसे क्षेत्रों में चिकित्सा कैम्प, फर्स्ट एड ट्रेनिंग, और पीड़ितों को तुरंत चिकित्सा सहायता पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। वन्य जीव संरक्षण के लिए जागरूकता कार्यक्रम, स्कूल और आंगनबाड़ी में जानवरों के बारे में सामान्य ज्ञान, और सुरक्षा के तरीके बताने वाली फिल्में/ऑडियो दिखाए जाने चाहिए।

संसद, विधानसभा और मीडिया की भूमिका

जिस तरह यह खबर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी है, उसी तरह संसद, राज्य विधानसभा, और मीडिया को भी जंगल-इंसान संघर्ष को प्रमुखता से उठाना चाहिए। इस विषय पर विशेष बहस, नई योजनाएं, संसाधन, आउटरीच, और पुनर्वास पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। मीडिया को भी सिर्फ सनसनी बनने के लिए नहीं, बल्कि हल निकालने के लिए ऐसी घटनाओं को प्रमुखता से दिखाना चाहिए।

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