जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने संत प्रेमानंद महाराज को दी संस्कृत की खुली चुनौती, धर्म जगत में मचा हड़कंप

A spiritual leader dressed in orange robes sits on an ornate silver throne, speaking into microphones beside a decorated table adorned with vibrant flower garlands. The background features traditional temple artwork, and in the top right corner, a circular inset displays another spiritual figure wearing yellow robes and a multicolored garland, set against a festive foreground.

मथुरा-वृंदावन: धार्मिक जगत में एक नया विवाद सामने आया है जब श्री तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य महाराज ने मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज को लेकर विवादास्पद बयान दिया है। रामभद्राचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रेमानंद महाराज न तो विद्वान हैं और न ही चमत्कारी, और उन्होंने उन्हें संस्कृत बोलने की खुली चुनौती दी है।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कई विवादास्पद बातें कहीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चमत्कार अगर है, तो मैं चैलेंज करता हूं प्रेमानंद जी एक अक्षर मेरे सामने संस्कृत बोलकर दिखा दें, या मेरे कहे हुए संस्कृत श्लोकों का अर्थ समझा दें।

मुख्य बयान और चुनौती

रामभद्राचार्य ने अपने बयान में कहा कि प्रेमानंद महाराज उनके बालक के समान हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “मैं आज खुलकर कह रहा हूं कि वो तो मेरे बालक के समान हैं। शास्त्र जिसको आए वही चमत्कार है”।

जगद्गुरु ने यह भी कहा कि चमत्कार वही कहलाता है, जो शास्त्रीय चर्चा में सहज हो और श्लोकों का स्पष्ट अर्थ बता सके। उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता क्षणभंगुर है और यह बहुत कम समय के लिए है।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद तब शुरू हुआ जब रामभद्राचार्य से पूछा गया कि सोशल मीडिया पर कई लोग वृंदावन आकर प्रेमानंद जी महाराज के लिए कहते हैं कि वह चमत्कार हैं। इस पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कोई चमत्कार नहीं है।

रामभद्राचार्य ने यह भी कहा कि पहले विद्वान लोग ही कथा वाचन किया करते थे, लेकिन आजकल मूर्ख लोग धर्म का ज्ञान दे रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका प्रेमानंद महाराज से कोई द्वेष या बैर नहीं है, लेकिन वो न उन्हें विद्वान मानते हैं, न कोई चमत्कारी पुरुष।

प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता

प्रेमानंद महाराज का भजन और प्रवचन भक्तों के बीच बेहद लोकप्रिय है। उनके आश्रम में देश और विदेश से आम भक्तों के साथ लोकप्रिय शख्सियतें भी दर्शन करने आती रहती हैं। सोशल मीडिया पर बाबा के प्रवचन के वीडियो तुरंत वायरल हो जाते हैं। वह हमेशा पीला वस्त्र धारण करते हैं और माथे पर पीला चंदन लगाते हैं।

उल्लेखनीय बात यह है कि प्रेमानंद महाराज पिछले 19 सालों से किडनी की बीमारी से ग्रस्त हैं। इसके बावजूद वे अपनी दैनिक आध्यात्मिक गतिविधियों में लगे रहते हैं, जिसे उनके भक्त चमत्कारिक मानते हैं।

रामभद्राचार्य की पहचान और योग्यता

रामभद्राचार्य चित्रकूट स्थित तुलसी पीठ के संस्थापक और प्रमुख हैं। उन्हें चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की उपाधि मिली है। वे 80 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं। जन्म से उनकी आंखें नहीं हैं लेकिन वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।

उनके आश्रम में भी लगातार सेलिब्रेटीज आते रहते हैं। रामभद्राचार्य को संस्कृत भाषा और धार्मिक शास्त्रों का गहरा ज्ञान है, जिसके कारण वे धर्म जगत में एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व माने जाते हैं।

संत समुदाय की प्रतिक्रिया

जैसे ही रामभद्राचार्य का यह वीडियो वायरल हुआ, वृंदावन के संतों में इस बात को लेकर आक्रोश पैदा हो गया। इसे लेकर वृंदावन के राधानंद गिरी महाराज के आश्रम पर संतों की बैठक हुई।

बैठक में दिनेश फलहारी ने कहा कि रामभद्राचार्य बड़े संत हैं। उन्हें अहंकार की ऐसी भाषा शोभा नहीं देती। उनकी वाणी में अहंकार झलक रहा है। महंत अभीदास और महेंद्र मधुसूदन महाराज ने कहा कि संत प्रेमानंद महाराज ने संतों को जोड़ने का काम किया है। उनके बारे में ऐसा बोला उचित नहीं है।

स्वामी चिदंबरानंद सरस्वती, आचार्य मधुसूदन महाराज, अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव महंत केशव स्वरूप ब्रह्मचारी ने एक स्वर में रामभद्राचार्य के कथन को गलत बताया है।

विद्वानों की राय

महंत केशव स्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि जिसे संस्कृत का ज्ञान हो, वो चमत्कारी हो जाएगा। वहीं अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत राजू दास ने कहा कि दोनों महान संत हैं। उन्हें इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए।

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सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट गया। किसी ने जगद्गुरु को अहंकारी बताया तो किसी ने प्रेमानंद महाराज की तारीफों के पुल बांध दिए। दोनों के समर्थक एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।

यह विवाद धर्म जगत में दो अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है – एक तरफ पारंपरिक शास्त्रीय ज्ञान पर आधारित दृष्टिकोण और दूसरी तरफ व्यावहारिक आध्यात्मिकता और भक्ति भावना पर आधारित दृष्टिकोण। रामभद्राचार्य की चुनौती अभी भी खुली है, और धर्म जगत इस बात का इंतजार कर रहा है कि इस मामले में आगे क्या होता है।

यह घटना एक बार फिर से इस बात को रेखांकित करती है कि आधुनिक समय में धार्मिक नेतृत्व और आध्यात्मिक प्राधिकार को लेकर विभिन्न मत हैं। जबकि कुछ लोग पारंपरिक शास्त्रीय ज्ञान को सर्वोपरि मानते हैं, वहीं अन्य व्यावहारिक भक्ति और सेवा भाव को अधिक महत्व देते हैं।

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