कांकेर, छत्तीसगढ़ – राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर रविवार को हुई एक सड़क दुर्घटना के बाद घटी घटना ने पुलिस प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केशकाल घाट क्षेत्र में एक ट्रेलर चालक द्वारा यात्रियों से भरी बस को टक्कर मारने के बाद जो कुछ हुआ, वह मानवाधिकारों और कानून के शासन के लिए चिंताजनक है।
घटना का विवरण: रविवार दोपहर केशकाल घाट पर एक तेज़ रफ्तार ट्रेलर ने यात्रियों से भरी बस को पीछे से जोरदार टक्कर मारी। हादसे में बस का पिछला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, हालांकि सौभाग्य से कोई यात्री गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ। घटना के तुरंत बाद ट्रेलर चालक अपने वाहन सहित मौके से फरार हो गया।
50 किमी का पीछा और गिरफ्तारी: पुलिस और स्थानीय लोगों ने मिलकर भागते ट्रेलर चालक का लगभग 50 किलोमीटर तक पीछा किया। चारामा के पास आखिरकार उसे घेरकर पकड़ लिया गया। यहीं से शुरू हुआ वह सिलसिला जिसने पूरे मामले को विवादास्पद बना दिया।
सरेआम हिंसा और पुलिस की भूमिका: पकड़े जाने के बाद आक्रोशित भीड़ ने ट्रेलर चालक की बीच सड़क पर जमकर पिटाई की। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ पुलिसकर्मी भी इस मारपीट में शामिल हो गए। घटना के दौरान चालक के बाल पकड़कर उसे सड़क पर घसीटा गया और उसके निजी अंगों पर भी हमला किया गया। दर्द से कराहते चालक को बचाने के लिए मौजूद पुलिस बल कुछ नहीं कर सका – या शायद करना नहीं चाहा।
वायरल वीडियो और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया: पूरी घटना का 43 सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ है। इस वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि कैसे भीड़ ने कानून अपने हाथ में लेकर चालक को सजा देने की कोशिश की। वीडियो में पुलिस की निष्क्रियता और कुछ पुलिसकर्मियों की सक्रिय भागीदारी दोनों स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया: घटना के बाद उच्च पुलिस अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू करने की घोषणा की है। पुलिस प्रशासन पर मोब लिंचिंग में भागीदारी के गंभीर आरोप लगे हैं, जिसके चलते दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि क्या वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई होगी।
न्याय व्यवस्था पर सवाल: इस घटना ने भारतीय न्याय व्यवस्था और पुलिस सुधार की आवश्यकता को एक बार फिर उजागर किया है। जबकि ट्रेलर चालक का कृत्य निंदनीय था, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर की गई हिंसा किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती। विशेषकर जब इसमें पुलिस की भूमिका संदिग्ध हो।
यह घटना छत्तीसगढ़ राज्य के लिए शर्मनाक है और देश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। समाज में बढ़ती मोब लिंचिंग की घटनाओं और पुलिस की इसमें भूमिका पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।