छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के आदिवासी बहुल गांव कुदरीडीह (डुमढोडगा) के बाशिंदों के लिए स्वच्छ पानी आज तक हकीकत नहीं बन पाया है। 78 साल की आज़ादी के बाद भी यहां के लोग पाइपलाइन के साफ पानी के लिए तरस रहे हैं और मजबूरन नाले के गंदे, मटमैले पानी का सहारा ले रहे हैं।
गांव की मजबूरी
कुदरीडीह में 40-50 परिवार हैं, जो दशकों से बरसाती नदी के किनारे खुद से बने ढोडी (छोटी झिरी या नाला) के पानी पर जीने को मजबूर हैं। इस ढोडी का पानी मिट्टी, काई, कचरे और कीड़ों से भरा हुआ है, लेकिन लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पानी को छानकर घर ले जाते हैं, लेकिन बर्तन में मिट्टी बाकी रह जाती है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि करीब 40-50 साल से यही तरीका चलन में है।
बारिश के दिनों की तकलीफ
बरसात के मौसम में मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। नदी में जब पानी भर जाता है, तो लोग खाली पात्र लेकर घंटों इंतजार करते हैं, तब जाकर कुछ पानी मिल पाता है। कई बार नदी इतनी गंदी हो जाती है कि पानी लेना भी मुमकिन नहीं रहता। ढोडी के आसपास फिसलन होने के कारण हादसों का डर भी बना रहता है।
स्वास्थ्य पर बुरा असर
इस गंदे पानी का गांववालों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। दस्त और अन्य पानी से जुड़ी बीमारियां यहां आम हैं। ऐसे में भी सरकारी तंत्र से कोई राहत नहीं मिली है। गांव अब तक जल जीवन मिशन से अछूता है—यहां न तो पाइपलाइन पहुंची है, न ही हैंडपंप लगा है।
दावों और वादों के बीच सच्चाई
सरकार दावा करती है कि गांव-गांव तक पाइप पानी पहुंच रहा है, लेकिन कुदरीडीह में इसकी कोई झलक नहीं दिखाई देती। ग्रामीणों के मुताबिक वे कई बार प्रशासन तक अपनी दिक्कतें पहुंचा चुके हैं, लेकिन सुधार अभी तक नहीं हुआ है।
ग्रामीणों की मांग
ऐसे गांवों के लिए तत्काल हैंडपंप या सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था की जरूरत है, खासकर बरसात के दिनों में। ग्रामीणों का कहना है कि वे कागजों में पानी के सपने देख चुके हैं, अब हकीकत में इस मूलभूत सुविधा के हकदार बनना चाहते हैं।
निष्कर्ष
कुदरीडीह की दास्तान विकास के दावों के बीच ठगे गए आम लोगों की पीड़ा का प्रतीक है—बरसात के मौसम में भी स्वच्छ पानी की एक बूंद तक को तरसते गांववासियों की हकीकत आज भी सुधार की दहलीज पर हाथ फैलाए खड़ी है।