जगदगुरु रामभद्राचार्य और संत प्रेमानंद महाराज विवाद: सफाई के बाद भी बना रहा तनाव

A spiritual leader dressed in orange robes sits on an ornate silver throne, speaking into microphones beside a decorated table adorned with vibrant flower garlands. The background features traditional temple artwork, and in the top right corner, a circular inset displays another spiritual figure wearing yellow robes and a multicolored garland, set against a festive foreground.

उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन में धार्मिक जगत का एक बड़ा विवाद 25 अगस्त 2025 को एक नया मोड़ लेने के बाद भी अनसुलझा बना हुआ है। जगदगुरु रामभद्राचार्य द्वारा संत प्रेमानंद महाराज को दी गई संस्कृत भाषा बोलने की चुनौती पर उनकी सफाई के बावजूद धार्मिक समुदाय में मतभेद कायम है।

विवाद की शुरुआत और चुनौती

मामला तब शुरू हुआ जब जगदगुरु रामभद्राचार्य ने एक पॉडकास्ट में संत प्रेमानंद महाराज पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “प्रेमानंद जी महाराज एक अक्षर संस्कृत का बोलकर मेरे सामने दिखा दें।” उन्होंने यह भी कहा कि प्रेमानंद महाराज न तो विद्वान हैं और न ही चमत्कारी, बल्कि वे उनके लिए एक बालक के समान हैं।

तुलसी पीठाधीश्वर जगदगुरु ने यह चुनौती देते हुए कहा था कि “यदि चमत्कार है तो मैं चैलेंज करता हूं कि प्रेमानंद जी महाराज मेरे कहे गए श्लोकों का अर्थ समझा दें।” इन बयानों के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर व्यापक विरोध देखने को मिला।

संतों का तीव्र विरोध

वृंदावन के राधानंद गिरि महाराज के आश्रम में संतों की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें कई प्रमुख धार्मिक व्यक्तित्वों ने रामभद्राचार्य की भाषा की आलोचना की। दिनेश फलाहारी ने कहा कि “इस तरह की भाषा किसी महान संत के अनुकूल नहीं है।” महंत अभिदास और महेंद्र मधुसूदन महाराज ने प्रेमानंद महाराज का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने संतों को एकजुट करने का काम किया है।

सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी के देवेशचार्य महाराज ने इसे “सनातन धर्म की मर्यादाओं के विपरीत” बताया और कहा कि संतों से संयम और शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है।

रामभद्राचार्य की सफाई और नई रणनीति

तीव्र विरोध के बाद 25 अगस्त को जगदगुरु रामभद्राचार्य ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने प्रेमानंद महाराज के बारे में कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की है और वे उन्हें पुत्र के समान मानते हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रेमानंद महाराज उनसे मिलने आएं तो वे उन्हें आशीर्वाद देंगे और उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करेंगे।

हालांकि, संस्कृत भाषा की चुनौती को वापस नहीं लेते हुए, रामभद्राचार्य ने अपने तर्क को और व्यापक बनाया। उन्होंने कहा कि हर हिंदू को संस्कृत सीखनी चाहिए और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक वेशभूषा धारण करने वाले व्यक्तियों को संस्कृत का ज्ञान होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति और व्यापक प्रभाव

26 अगस्त 2025 तक यह विवाद पूरी तरह सुलझा नहीं है। रामभद्राचार्य ने अपनी भाषा को नरम करने की कोशिश की है, लेकिन संस्कृत ज्ञान की मूल चुनौती को बरकरार रखा है। उन्होंने इसे सांस्कृतिक समझ के व्यापक संदर्भ में रखकर प्रस्तुत किया है।

धार्मिक समुदाय में अभी भी दो गुट दिख रहे हैं। एक तरफ पारंपरिक विद्वत्ता और शास्त्रीय ज्ञान को महत्व देने वाले हैं, तो दूसरी तरफ जनसामान्य में लोकप्रिय और सुगम भाषा में धार्मिक शिक्षा देने वाले कथावाचकों के समर्थक हैं।

यह विवाद हिंदू धार्मिक जगत में आध्यात्मिक अधिकार के आधार, संस्कृत ज्ञान की भूमिका, और धार्मिक नेताओं के बीच एकता के सवालों को उजागर करता है। प्रेमानंद महाराज की तरफ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि पाकिस्तान तक में इस विवाद पर चर्चा हो रही है।

रामभद्राचार्य ने अपनी सफाई में सनातन धर्म को कमजोर करने वाली शक्तियों के खिलाफ संतों की एकता का आह्वान किया है, लेकिन यह विवाद धार्मिक समुदाय में मौजूदा तनावों को और भी गहरा बना रहा है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top