रायपुर की एक निजी अस्पताल में बच्चों की अदला-बदली का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। यह मामला 2023 का है जब एक महिला ने रायपुर के प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। प्रसव के तुरंत बाद डॉक्टरों ने परिवार को बताया था कि उन्हें एक लड़का और एक लड़की हुई है, लेकिन कुछ घंटों बाद जब बच्चों को माता-पिता के हवाले किया गया तो दोनों ही लड़कियां थीं।
परिवार को शुरू में लगा कि शायद कोई भ्रम हुआ हो या डॉक्टरों से गलती हुई हो, लेकिन जब उन्होंने इस बारे में अस्पताल प्रशासन से बात की तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। परिवार का संदेह और गहरा हो गया जब उन्होंने देखा कि दोनों में से एक बच्ची का रंग-रूप और शारीरिक गठन उनसे बिल्कुल मेल नहीं खाता था। इस शक की पुष्टि तब हुई जब परिवार ने अपनी जिम्मेदारी पर डीएनए टेस्ट कराने का फैसला लिया।
डीएनए परीक्षण की रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासा हुआ। रिपोर्ट के अनुसार एक बच्ची का डीएनए तो जैविक माता-पिता से पूरी तरह मेल खा रहा था, लेकिन दूसरी बच्ची का डीएनए बिल्कुल भी मेल नहीं खाता था। यह साफ संकेत था कि अस्पताल में बच्चों की अदला-बदली हुई है और उनका जैविक बेटा कहीं और है। इस रिपोर्ट के बाद परिवार ने तत्काल कानूनी कार्रवाई शुरू की और अस्पताल के निदेशक तथा वहां की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए परिवार ने पहले स्थानीय पुलिस से संपर्क किया और एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। लेकिन पुलिस प्रशासन ने इस संवेदनशील मामले में तत्काल कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। इसके बाद परिवार ने न्यायिक मार्ग अपनाने का फैसला लिया और बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। परिवार की मांग थी कि अस्पताल के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और उनके जैविक बेटे को खोजा जाए।
बिलासपुर हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान अस्पताल प्रशासन ने सभी आरोपों से इनकार किया। अस्पताल की ओर से तर्क दिया गया कि उनके यहां ऐसी कोई गलती नहीं हुई है और सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार की गई थीं। अदालत ने मामले की जांच के लिए छह विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक समिति गठित की। इस समिति में अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल चिकित्सक और फोरेंसिक विशेषज्ञ शामिल थे।
विशेषज्ञ समिति ने अस्पताल के रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य सबूतों की जांच की। समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि उन्हें कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिला जो बच्चों की अदला-बदली की पुष्टि करता हो। समिति के अनुसार अस्पताल की सभी प्रक्रियाएं मानक नियमों के अनुसार थीं और कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। इस रिपोर्ट के आधार पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने परिवार की याचिका खारिज कर दी और अस्पताल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया।
हाई कोर्ट के फैसले से निराश होकर परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए केवल अस्पताल की बात मान ली है। परिवार का कहना था कि डीएना रिपोर्ट सबसे प्रामाणिक सबूत है जो साफ तौर पर साबित करती है कि उनका जैविक बेटा उनके पास नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मनोज कुमार और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए 3 सितंबर को याचिका स्वीकार कर ली। न्यायालय ने कहा कि यह एक अत्यंत संवेदनशील मामला है जिसमें एक परिवार की पूरी जिंदगी दांव पर लगी है। डीएनए रिपोर्ट जैसे वैज्ञानिक प्रमाण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल प्रशासन, राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करके चार सप्ताह में जवाब मांगा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस मामले में विस्तृत जांच की आवश्यकता है और सभी पहलुओं पर गौर करना होगा। अब अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी जिसमें सभी पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी।
यह मामला न केवल एक परिवार की व्यथा है बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। निजी अस्पतालों में बढ़ती लापरवाही और जवाबदेही की कमी चिंता का विषय है। मरीजों का भरोसा ही चिकित्सा व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है, जिसे बनाए रखना हर अस्पताल की प्राथमिकता होनी चाहिए।