छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों का खूनी खेल एक बार फिर सामने आया है। पिछले तीन दिनों में माओवादियों ने दो शिक्षादूतों की निर्मम हत्या कर दी है, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। ये शिक्षादूत वे लोग हैं जो बस्तर के अंदरूनी गांवों में शिक्षा की मशाल जलाने का काम कर रहे थे, लेकिन अब वे माओवादियों के निशाने पर हैं।
29 अगस्त की देर शाम को बीजापुर जिले के गंगालूर क्षेत्र के नेन्द्रा गांव में तैनात शिक्षादूत कल्लू ताती की माओवादियों ने धारदार हथियारों से बेरहमी से हत्या कर दी। इससे महज दो दिन पहले 27 अगस्त को सुकमा जिले के मंडीमरका गांव में शिक्षादूत बारसे लक्ष्मण को माओवादियों ने मार डाला था। लक्ष्मण की हत्या का मामला और भी दर्दनाक है क्योंकि माओवादियों ने उसे घर से घसीटकर बाहर निकाला और परिवार के सामने लाठियों और कुल्हाड़ी से हमला कर मौत के घाट उतार दिया। जब उसकी पत्नी ने रोकने की कोशिश की तो हमलावरों ने उसे भी पीटा।
यह कोई पहली घटना नहीं है। इस साल बस्तर क्षेत्र में माओवादियों ने कई शिक्षादूतों को निशाना बनाया है। 15 अगस्त को नारायणपुर जिले में एक शिक्षादूत की हत्या की गई, जबकि पिछले महीने बीजापुर जिले के फरसेगढ़ इलाके में पुलिस मुखबिर होने के शक में दो शिक्षादूतों की हत्या कर दी गई थी। इससे पहले 19 फरवरी को दंतेवाड़ा जिले में भी एक शिक्षादूत समेत दो लोगों की हत्या हुई थी।
बस्तर में शिक्षा व्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 2019 में शिक्षादूत कार्यक्रम शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत स्थानीय युवाओं को शिक्षक बनाकर उन स्कूलों में भेजा गया जो सालों से बंद पड़े थे। सुकमा और बीजापुर जिलों में कुल 464 शिक्षादूत नियुक्त किए गए हैं, जो अत्यंत कठिन परिस्थितियों में आदिवासी बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहे हैं।
हालांकि इन शिक्षादूतों के सामने कई चुनौतियां हैं। सरकार द्वारा तय 12,500 रुपये मासिक मानदेय के बजाय उन्हें केवल 10,000 से 11,000 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा लगातार माओवादियों से मिल रही धमकियों के कारण उनकी जान हमेशा खतरे में रहती है। आंकड़ों के अनुसार 2018 से अब तक लगभग 55 शिक्षादूतों को माओवादियों से धमकियां मिली हैं और अब तक 9 शिक्षादूतों की हत्या हो चुकी है।
शिक्षादूत गंभीर तेलाम ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि वे सलवा जुडूम के दौरान बंद हुए स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, लेकिन उनकी कई समस्याएं हैं। नक्सली उन्हें धमकी देते हैं, उनके साथियों को मार रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से गंभीरता नजर नहीं आती। उन्होंने नियमित नियुक्ति और मानदेय बढ़ाने की मांग की है।
शिक्षादूतों की कई मांगें हैं जिनमें प्रमुख हैं- हत्या करने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास नीति बंद करना, शिक्षक भर्ती में शिक्षक पात्रता परीक्षा से मुक्ति देकर डिप्लोमा कोर्स के अनुसार प्राथमिकता देना, और हत्या के शिकार शिक्षादूतों के परिवारों को 50 लाख रुपये आर्थिक मुआवजा तथा अनुकंपा नियुक्ति देना। वे जीवन बीमा कवर की भी मांग कर रहे हैं।
बस्तर संभाग के आईजी पुलिस सुंदरराज का कहना है कि सुरक्षाबल माओवादियों पर लगातार ऑपरेशन कर रहे हैं। पिछले डेढ़ साल में 400 से ज्यादा माओवादियों के शव बरामद किए गए हैं, जिसमें उनके टॉप लीडर भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि माओवादियों की पुरानी रणनीति है कि जब वे दबाव में होते हैं तो आम जनता में दहशत फैलाने के लिए शिक्षा और विकास कार्यों में लगे लोगों को निशाना बनाते हैं। लेकिन अब आम जनता उनके दहशत में नहीं आएगी और माओवादियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई जारी है।
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सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि बच्चों या शिक्षादूतों की हत्या में शामिल रहे माओवादियों को सरेंडर करने पर भी पुनर्वास नीति के लाभ नहीं मिलेंगे। नई नक्सल सरेंडर और पुनर्वास नीति 2025 में आर्थिक सहायता, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा के प्रावधान हैं, लेकिन हिंसक अपराधों में शामिल व्यक्तियों को इससे बाहर रखा गया है।
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राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी आई है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि सरकार लगातार दावा कर रही है कि माओवादी बैकफुट पर हैं, लेकिन वे आदिवासियों और आम जनता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सरकार को वहां जनता की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव ने इसे माओवादियों की कायराना करतूत बताया और कहा कि जिस तरह से सरकार काम कर रही है, बस्तर जल्द ही शांति का टापू बनेगा।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने माओवाद समस्या को खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षा बलों के अभियान तेज किए गए हैं। बस्तर में 700 से ज्यादा स्कूल बंद थे, जिनमें से कई को दोबारा खोला गया है, लेकिन हिंसा की घटनाएं चिंताजनक हैं।
सात जिलों वाले बस्तर क्षेत्र में इस साल अब तक माओवादी हिंसा में 30 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसमें न केवल शिक्षादूत बल्कि आम नागरिक भी शामिल हैं। 13 साल के एक बच्चे की भी हत्या की गई है, जबकि 15 अगस्त को कांकेर के बिनागुंडा गांव में तिरंगा फहराने वाले युवक मनेश नरेटी को भी मार डाला गया।
ये घटनाएं बताती हैं कि माओवादी अब सिर्फ सुरक्षा बलों को निशाना नहीं बना रहे बल्कि उन लोगों को भी मार रहे हैं जो शिक्षा और विकास के काम में लगे हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरनाक है बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास में भी बाधक है। शिक्षादूतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उनकी समस्याओं का समाधान करना अब सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि बस्तर के बच्चों का भविष्य अंधकार में न डूबे।