राजनांदगांव स्कूल यौन शोषण मामले में प्रधानाध्यापक फरार, ग्रामीणों का सहायक शिक्षक के समर्थन में आंदोलन

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित मोहबा प्राथमिक शाला में एक गंभीर यौन शोषण मामला सामने आया है, जहां प्रधानाध्यापक नेत्राम वर्मा पर छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार और अश्लील वीडियो दिखाने के आरोप लगे हैं। इस मामले में प्रधानाध्यापक फरार हो गया है, जबकि स्थानीय ग्रामीणों ने सस्पेंड किए गए सहायक शिक्षक देसाम प्रसाद तिवारी के समर्थन में आंदोलन शुरू कर दिया है।

गंभीर आरोप और पॉक्सो के तहत मामला दर्ज

मामले के अनुसार, प्रधानाध्यापक नेत्राम वर्मा पर छात्राओं को अपने कार्यालय में बुलाकर अश्लील वीडियो दिखाने और उनसे अनुचित स्पर्श करने के घिनौने आरोप लगे हैं। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, स्थानीय पुलिस ने वर्मा के विरुद्ध पॉक्सो एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत एफआईआर दर्ज की है। यह कानून बच्चों के यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है और इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, आरोपी प्रधानाध्यापक ने मामला सामने आने के बाद से फरार होने का रास्ता अपनाया है। वर्तमान में पुलिस टीम आरोपी की सक्रिय तलाश कर रही है और इसके लिए उसके घर के साथ-साथ रिश्तेदारों के घरों पर भी छापेमारी की जा रही है। छत्तीसगढ़ में हाल के दिनों में स्कूली शिक्षकों द्वारा छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार के मामले बढ़ रहे हैं।

सहायक शिक्षक के समर्थन में ग्रामीण एकजुट

मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब स्थानीय ग्रामीणों ने सस्पेंड किए गए सहायक शिक्षक देसाम प्रसाद तिवारी के पक्ष में आवाज उठाई। ग्रामीणों ने विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह को एक औपचारिक पत्र सौंपकर तिवारी की तत्काल बहाली की मांग की है। समुदाय का तर्क है कि सहायक शिक्षक का इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है।

ग्रामीणों के तर्क और विरोध प्रदर्शन

स्थानीय समुदाय के अनुसार, सहायक शिक्षक देसाम प्रसाद तिवारी ने जैसे ही इन आरोपों की जानकारी मिली, तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को इस बारे में सूचित किया था। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग ने अनावश्यक कार्रवाई करके यह दिखाने की कोशिश की है कि वे ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई करने में पीछे नहीं हैं। समुदाय का आरोप है कि विभागीय कार्रवाई तथ्यों के बजाय केवल जनसंपर्क की चिंताओं से प्रेरित लगती है।

ग्रामीणों का स्पष्ट मत है कि तिवारी का सस्पेंशन न्याय की तुलना में तत्काल प्रतिक्रिया दिखाने के लिए किया गया एक गैर-जरूरी विभागीय कदम है। वे मांग कर रहे हैं कि एक निष्पक्ष जांच के आधार पर ही कोई भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

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