भिलाई चरोदा निगम क्षेत्र में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। शहर की सड़कों, गलियों और मोहल्लों में कुत्तों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि आमजन का घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया है। रोज नए हमले, मासूम बच्चों की चीखें और अस्पतालों में रेबीज इंजेक्शन की डिमांड– यह सब भिलाई की वर्तमान स्थिति को बयां करता है। स्थानीय प्रशासन की अनदेखी और संसाधनों की कमी इस समस्या को और विकट बना रही है।
बुधवार को बिजली नगर कॉलोनी की 8 वर्षीय बच्ची किरण जब शाम को अपने दोस्तों के साथ खेलने गई, तभी एक आवारा कुत्ते ने अचानक हमला कर दिया। कुत्ता बार-बार उसे नोचता रहा। हाथ और पैरों से खून बहने लगा, मोहल्ले के लोगों ने किसी तरह उसे बचाया। बच्ची को सुपेला अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी आंखों से डर और दर्द के आंसू लगातार बह रहे थे। डॉक्टरों ने रेबीज और टिटनेस के इंजेक्शन लगाए, लेकिन बच्ची के मासूम चेहरे पर खौफ साफ झलक रहा था।
ऐसा ही एक मामला जून माह में देखने को मिला, जब गांधी नगर भिलाई-तीन के ढाई साल के एक मासूम पर आवारा कुत्तों ने हमला कर दिया। बच्चे के कूल्हे, पेट और पैरों में कई जगह गहरे जख्म हो गए। मोहल्लेवालों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया, लेकिन नजारे ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी।
भिलाई के सिरसा गेट चौक के निकट ही एक समूह में घूम रहे कुत्तों ने बीते एक महीने में 10 से अधिक लोगों को काटा है। इनमें छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल हैं। गली-मोहल्लों में रहने वाले लोग शाम के समय घर से बाहर निकलने में घबराने लगे हैं। बच्चों को स्कूल भेजने वाले माता-पिता हर वक्त डर रहते हैं कि कहीं फिर कोई अनहोनी न हो जाए।
नगर निगम प्रशासन से बार-बार शिकायतें की जा रही हैं– लेकिन निगम के पास न तो आवारा कुत्तों को पकड़ने के संसाधन हैं और न ही कोई स्थाई समाधान। कोरोनाकाल के दौरान बधियाकरण कार्यक्रम बंद हो गया था, जिसके बाद से शहर में कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 40 वार्ड वाले इस निकाय में एक भी डॉग हाउस नहीं है। नगर निगम के अधिकारी इस समस्या को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिससे अब आमजन का आक्रोश बढ़ने लगा है।
भिलाई-तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रोजाना 5 से 6 केस कुत्ते के काटने के आ रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, हर बाइट केस पर टिटनेस और रेबीज इंजेक्शन जरूरी हैं। वहीं, कई बार गंभीर मामलों में घाव को ठीक होने में महीनों लग जाते हैं। हर वर्ष डॉग बाइट के मामले दोगुने होते जा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा है।
मोहल्लों में आवारा कुत्तों के झुंड सड़कों पर आम बात हो गई है। दोपहिया वाहन सवार लोगों के लिए भी रात के समय सड़कों पर निकलना डरावना अनुभव है। कई बार कुत्तों का समूह वाहन सवारों के पीछे पड़ जाता है, जिससे दुर्घटनाएं भी होती हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं।
प्रशासन द्वारा कुत्तों को पकड़ने के लिए न तो कभी विशेष टीम बनाई गई है, न ही कोई रेस्क्यू वैन उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर लोग वीडियो डालकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असल राहत जमीन पर नहीं दिखाई देती। गली-मोहल्लों के अधिकांश लोग अब खुद ही कुत्तों को भगाने के लिए उपाय खोज रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कुत्ते द्वारा काटे जाने पर प्रभावित व्यक्ति को तुरंत पानी और साबुन से घाव धुलना चाहिए। बाद में नजदीकी अस्पताल पहुंचकर आवश्यक इंजेक्शन लगवाना जरूरी है। इसमें लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। बीते दिनों बदायूं में एक बच्ची की मौत सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि कुत्ते ने उसके पुराने घाव को चाटा था और रेबीज संक्रमण फैल गया।
भिलाई की घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर किया है। क्षेत्र की जनता लगातार नगर निगम से मांग कर रही है कि कुत्तों का बधियाकरण फिर से शुरू हो, डॉग हाउस बनाया जाए और पकड़ने के लिए संसाधन जुटाए जाएं। बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराया जाए, ताकि स्कूल और पार्क में जाना सुरक्षित हो सके।
देशभर में भी आवारा कुत्तों का मुद्दा तेजी से बढ़ रहा है। केंद्र सरकार ने हाल ही में गाइडलाइन जारी की है कि सभी राज्यों को अपने क्षेत्र के 70 फीसदी आवारा कुत्तों का बधियाकरण करना अनिवार्य है। साथ ही डॉग पॉपूलेशन कंट्रोल के लिए रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। मगर भिलाई में इसकी धरातल पर सफलता फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आती है।
पड़ोस के दुर्ग-रिसाली क्षेत्र में भी यही हालात हैं। पूरे जिले में हजारों आवारा कुत्ते घूम रहे हैं, जिनका कोई मेनजमेंट नहीं हो रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक स्थानीय प्रशासन सक्रिय होकर जनसंख्या नियंत्रण, नसबंदी और डॉग हाउस निर्माण नहीं करता, तब तक इस संकट को टालना असंभव है।
जनजागरूकता अभियान, स्कूलों में शिक्षण, गली मोहल्लों में निगरानी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है। भिलाई की जनता आशा रखती है कि जल्द ही निगम और स्वास्थ्य विभाग उचित कदम उठाएंगे, ताकि उनके बच्चों की जिंदगी सुरक्षित रह सके।